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नई दिल्ली। ओडिशा के पुरी में हाल ही में संपन्न हुई विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को अब राष्ट्रपति भवन में भी स्थान मिलने जा रहा है। भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के पवित्र रथों के पहियों को राष्ट्रपति भवन परिसर में स्थापित किया जाएगा। यह पहल ओडिशा की समृद्ध परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने का प्रयास है।
राष्ट्रपति भवन में स्थापित किए जाने वाले ये पहिए भगवान जगन्नाथ के रथ ‘नंदीघोष’, भगवान बलभद्र के रथ ‘तालध्वज’ और देवी सुभद्रा के रथ ‘दर्पदलन’ से जुड़े हैं। इन रथों को हर साल पुरी में आयोजित होने वाली ऐतिहासिक रथ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु भगवान के नाम का जाप करते हुए खींचते हैं।
पुरी की रथ यात्रा भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर साल आषाढ़ महीने में आयोजित होने वाली इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। इस दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं और इस भव्य आयोजन का हिस्सा बनते हैं।
रथ यात्रा में इस्तेमाल होने वाले विशाल लकड़ी के रथ अपनी भव्यता और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। इन रथों को विशेष परंपराओं और नियमों के अनुसार तैयार किया जाता है। रथों के पहिए केवल यात्रा का हिस्सा नहीं होते, बल्कि भक्तों के लिए आस्था और भगवान के प्रति समर्पण का प्रतीक माने जाते हैं।
भगवान जगन्नाथ का रथ ‘नंदीघोष’ सबसे प्रमुख माना जाता है। भगवान बलभद्र के रथ को ‘तालध्वज’ और देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ कहा जाता है। इन तीनों रथों के पहियों को राष्ट्रपति भवन में स्थापित करना पुरी की धार्मिक परंपरा और ओडिशा की सांस्कृतिक धरोहर को सम्मान देने के रूप में देखा जा रहा है।
इस पहल का उद्देश्य देश के नागरिकों और राष्ट्रपति भवन आने वाले आगंतुकों को भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराना है। राष्ट्रपति भवन देश के सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों में से एक है और यहां विभिन्न राज्यों की कला, संस्कृति और विरासत को प्रदर्शित करने के लिए कई प्रयास किए जाते रहे हैं।
ओडिशा की संस्कृति में भगवान जगन्नाथ का विशेष स्थान है। जगन्नाथ परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की कला, संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन से भी गहराई से जुड़ी हुई है। रथ यात्रा इस परंपरा का सबसे बड़ा सार्वजनिक उत्सव है, जिसमें हर वर्ग और समुदाय के लोग शामिल होते हैं।
रथों के पहियों को राष्ट्रपति भवन में स्थापित किए जाने से ओडिशा और देश के अन्य हिस्सों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूती मिलेगी। यह उन लाखों श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान है, जो हर साल रथ यात्रा में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन करते हैं।
राष्ट्रपति भवन में ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को स्थान देना भारतीय विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे आने वाली पीढ़ियां देश की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बेहतर तरीके से समझ सकेंगी।
पुरी की रथ यात्रा सदियों पुरानी परंपरा है और इसे दुनिया भर में भगवान जगन्नाथ की भक्ति और समावेशी संस्कृति के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। रथों के पहिए इस यात्रा की गति, श्रद्धा और सामूहिक आस्था का प्रतीक हैं।
अब जब भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों के पहिए राष्ट्रपति भवन में स्थापित होंगे, तो यह केवल ओडिशा की पहचान को सम्मान नहीं देगा, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक विरासत को भी प्रदर्शित करेगा।
यह कदम पुरी की रथ यात्रा की महत्ता को राष्ट्रीय मंच पर और अधिक मजबूती देगा और राष्ट्रपति भवन आने वाले लोगों को भारत की प्राचीन परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करेगा।





